NCERTCh 10निःशुल्क

स मे प्रियः

🎓 Class 11📖 Bhaswati📖 10 नोट्स🧠 15 प्रश्न-उत्तर⏱️ ~15 मिनट

स मे प्रियःअध्ययन नोट्स

NCERT-संरेखित · 10 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए

दशम: पाठ:

व्याख्या

दशम: पाठ:

यह अध्याय 'स मे प्रिय:' श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय से संगृहीत है, जो भक्तियोग का वर्णन करता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को साकार और निराकार रूप में भगवत्प्राप्ति का सरलतम मार्ग बताया है। वर्तमान समय में जब लोग अहंकार से ग्रस्त होकर शीघ्र फल की इच्छा रखते हैं, तब यह पाठ हमें संयम, अभ्यास और परमार्थ के लिए प्रेरित करता है। पाठ का शीर्षक 'स मे प्रिय:' यह दर्शाता है कि ईश्वर को वे लोग प्रिय हैं जो स्वार्थ त्यागकर समाज और परमार्थ के लिए कार्य करते हैं। इस अध्याय में संनियम्येन्द्रियग्रामं, समाधातुं चित्तं, अभ्यासयोग, कर्मफलत्याग, तथा योगी के गुणों का वर्णन है। यह पाठ विशेष रूप से ज्ञानपिपासु छात्रवर्ग के लिए अत्यंत उपयोगी और तर्कसंगत है। इसमें बताया गया है कि सच्चा भक्त वही है जो अपने मन और बुद्धि को ईश्वर में लगाकर सभी कर्मों का त्याग करता है और समभाव से सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।

  • पाठ श्रीमद्भगवद्गीता के द्वादश अध्याय से लिया गया है।
  • यह भक्तियोग का सरलतम मार्ग बताता है।
  • ईश्वर को वे प्रिय हैं जो स्वार्थ त्यागकर परमार्थ में लगे हैं।
  • अहंकार त्यागकर संयम और अभ्यास आवश्यक है।
  • सच्चा भक्त समभाव और कर्मफलत्यागी होता है।
  • 📌 भक्तियोग: ईश्वर की भक्ति और ध्यान का योग।
  • 📌 कर्मफलत्याग: कर्म के फल की इच्छा त्यागना।
  • 📌 संनियम्येन्द्रियग्रामं: इन्द्रियों का संयम।

श्रीभगवानुवाच

व्याख्या

श्रीभगवानुवाच

इस खंड में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को योग के मार्ग का उपदेश दिया है। वे कहते हैं कि जो लोग इन्द्रियों को संयमित कर लेते हैं और सभी प्राणियों के हित में समबुद्धि से कार्य करते हैं, वे मुझमें निवास करते हैं। ऐसे लोग क्लेशों से अधिक ग्रस्त होते हैं क्योंकि वे अव्यक्त (अदृश्य) से आसक्त नहीं होते। जो व्यक्ति अपने सारे कर्म मुझमें समर्पित कर देता है और अनन्य भाव से मुझमें लीन रहता है, मैं उसे शीघ्र मृत्यु-संसार से उद्धार देता हूँ। भगवान कहते हैं कि मन और बुद्धि को मुझमें लगाओ, तब तुम्हें मुझमें ही निवास करना होगा, इसमें कोई संशय नहीं। यदि चित्त स्थिर नहीं हो पाता तो अभ्यासयोग से मुझमें लगो। यदि अभ्यास में भी असमर्थ हो तो कर्मों का त्याग कर मुझमें आश्रित हो जाओ। ज्ञान अभ्यास से श्रेष्ठ है, ध्यान ज्ञान से श्रेष्ठ है, और कर्मफलत्याग ध्यान से श्रेष्ठ है। त्याग से शांति आती है। इस प्रकार भगवान ने भक्तियोग के विभिन्न चरणों और गुणों का वर्णन किया है।

  • इन्द्रियों का संयम और समबुद्धि आवश्यक है।
  • सभी कर्मों का भगवान में समर्पण उद्धार का मार्ग है।
  • मन और बुद्धि को भगवान में लगाना चाहिए।
  • अभ्यासयोग और कर्मफलत्याग से शांति प्राप्त होती है।
  • भगवान भक्तों को मृत्यु-संसार से मुक्त करते हैं।
  • 📌 अव्यक्त: अदृश्य, जो मन से आसक्त नहीं।
  • 📌 अनन्येनैव: केवल एकाग्रचित्त होकर।
  • 📌 कर्मफलत्याग: कर्म के फल की इच्छा त्यागना।

पाठ का मूल संस्कृत पाठ

व्याख्या

पाठ का मूल संस्कृत पाठ

इस खंड में 'स मे प्रिय:' के मूल संस्कृत श्लोक प्रस्तुत हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण के भक्तियोग के उपदेशों को संक्षेप में व्यक्त करते हैं। श्लोकों में बताया गया है कि जो मन, बुद्धि और इन्द्रियों को संयमित कर भगवान में लीन रहता है, जो सभी प्राणियों के हित

अभ्यास प्रश्नस मे प्रियः

NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित

Q1.अधोलिखित-प्रश्नानाम् उत्तराणि संस्कृतभाषया देयानि- (क) एतानि पद्यानि क: कं प्रति कथयति? (ख) वक्ता सर्वाणि कर्माणि कस्मिन् न्यसितुं कथयति? (ग) ब्रह्माणि चित्तं स्थिरं कर्तुं किम् आवश्यकम्? (घ) कस्मिन् रता: जना: ब्रह्म प्राप्नुवन्ति? (ङ) षष्ठे पद्मे महर्षिणा के गुणा: वर्णिता:? (च)

उत्तर:

उत्तर- (क) एतानि पद्यानि महर्षि पतंजलिः योगस्य महत्त्वं दर्शयन् योगाभ्यासस्य फलानि कथयति। (ख) वक्ता सर्वाणि कर्माणि मनसि, वाचि, काये च संयोजयितुं कथयति। अर्थात् कर्माणि चित्ते संयोज्य स्थिरता साधनीया। (ग) ब्रह्माणि चित्तं स्थिरं कर्तुं अभ्यासः आवश्यकः। निरन्तर अभ्यासेन चित्तं एकाग्रं कर्तुं शक्यते। (घ) रताः जना: योगाभ्यासे रताः सन्ति, ते ब्रह्म प्राप्नुवन्ति। अर्थात् योगाभ्यासे मनो लग्नं जनाः मोक्षमार्गं प्राप्नुवन्ति। (ङ) षष्ठे पद्मे महर्षिणा संयम, धैर्य, शान्ति, एकाग्रता, विवेक, समाधि इति गुणा: वर्णिता:। (च) प्रश्न अधूरा है, अतः उत्तर नहीं दिया जा सकता।

व्याख्या:

प्रत्येक प्रश्न का उत्तर संस्कृत में दिया गया है, जो पाठ के अनुसार योगाभ्यास, मनोवृत्ति, और महर्षि पतंजलि के गुणों पर आधारित है। अभ्यास से चित्त की स्थिरता, कर्मों का संयोजन, और ब्रह्म प्राप्ति की प्रक्रिया समझाई गई है।

MediumNCERT
Q2.अभ्यासे अपि असमर्थ: जन: कथं सिद्धिमवाप्स्यति? (छ) नवम-पद्यानुसारं ‘मत्कर्मपरत्वे अशक्तौ सत्यां’ किं कर्तव्यम्?

उत्तर:

अभ्यासे अपि असमर्थ: जन: यदि सिद्धि प्राप्ति में असमर्थ है, तो उसे धैर्यपूर्वक पुनः प्रयास करना चाहिए। निरंतर अभ्यास और समर्पण से ही सिद्धि संभव है। नवम पद्यानुसार, ‘मत्कर्मपरत्वे अशक्तौ सत्यां’ अर्थात् जब कोई व्यक्ति अपने कर्मों को करने में असमर्थ हो, तब उसे सत्य के मार्ग पर दृढ़ रहना चाहिए और कर्मों का परित्याग नहीं करना चाहिए। उसे अपने कर्तव्य का पालन ईश्वर की भक्ति और श्रद्धा के साथ करना चाहिए।

व्याख्या:

सिद्धि के लिए निरंतर अभ्यास आवश्यक है। असमर्थता आने पर भी हार नहीं माननी चाहिए। नवम पद्य के अनुसार कर्मों का परित्याग नहीं करना चाहिए, बल्कि ईश्वर की भक्ति के साथ कर्म करते रहना चाहिए।

MediumNCERT
Q3.ईश्वरस्य प्रियत्वं प्राप्नुम् के गुणा: आवश्यका: सन्ति? विस्तरेण लिखत-

उत्तर:

ईश्वरस्य प्रियत्वं प्राप्नुम् निम्नलिखित गुणाः आवश्यकाः सन्ति: 1. भक्तिः - ईश्वर के प्रति समर्पित प्रेम और श्रद्धा। 2. सत्यनिष्ठा - सत्य का पालन और ईमानदारी। 3. क्षमा - दूसरों को क्षमा करने की क्षमता। 4. दया - परोपकार और करुणा भाव। 5. संयम - इन्द्रियों और वासनाओं पर नियंत्रण। 6. निष्ठा - अपने धर्म और कर्तव्य के प्रति दृढ़ता। 7. शान्ति - मन की शान्ति और स्थिरता। ये गुण व्यक्ति को ईश्वर के प्रिय बनाते हैं।

व्याख्या:

ईश्वर की भक्ति और प्रेम प्राप्ति के लिए उपरोक्त गुण आवश्यक हैं। ये गुण व्यक्ति को आध्यात्मिक उन्नति की ओर ले जाते हैं और ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है।

MediumNCERT
Q4.प्रदत्तानां पद्मांशानाम् भावार्थम् लिखत- (क) सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो:। (ख) मयेव मन आधल्स्व मयि बुद्धिं निवेशय। (ग) यो न ह्ययति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय:।।

उत्तर:

(क) सम: शत्रौ च मित्रे च तथा मानापमानयो: - व्यक्ति को शत्रु और मित्र दोनों के प्रति समान भाव रखना चाहिए, तथा मान-सम्मान और अपमान दोनों को समान रूप से सहन करना चाहिए। (ख) मयेव मन आधल्स्व मयि बुद्धिं निवेशय - मन और बुद्धि को केवल मुझमें (ईश्वर में) लगाओ, अर्थात् समर्पित करो। (ग) यो न ह्ययति न द्वेष्टि न शोचति न काङ्क्षति। शुभाशुभपरित्यागी भक्तिमान्य: स मे प्रिय:।। - जो न तो किसी से द्वेष करता है, न शोक करता है, न कामना करता है, और शुभ-अशुभ का त्याग करता है, वह भक्त जो समभाव से भरा है, वह मेरा प्रिय है।

व्याख्या:

प्रत्येक पद्यांश का भावार्थ समझना आवश्यक है। ये पद्यांश ईश्वर की भक्ति में समभाव, समर्पण और निष्काम भाव को दर्शाते हैं।

MediumNCERT
Q5.पञ्चमं पद्ममाधृत्य लिखत- कस्मात् क: श्रेय:? यथा-

उत्तर:

पञ्चमं पद्ममाधृत्य प्रश्न है कि किससे श्रेष्ठता प्राप्त होती है। इस पद्म के अनुसार, श्रेष्ठता उस व्यक्ति से होती है जो ईश्वर की भक्ति में निष्ठावान हो, जो समभाव से सभी प्राणियों को देखे, जो अपने कर्मों का फल न चाहे और जो शुभ-अशुभ का त्याग कर ईश्वर की सेवा करता हो। इस प्रकार का व्यक्ति सर्वश्रेष्ठ है।

व्याख्या:

पञ्चम पद्म में श्रेष्ठता का आधार भक्ति, समभाव और निष्काम कर्म है। जो व्यक्ति इन गुणों से युक्त होता है, वह श्रेष्ठ कहलाता है।

MediumNCERT
Q6.5. ईश्वरस्य स्वगुरुजनानां च प्रिया: भवितुम् भवन्त: किं करिष्यन्ति?

उत्तर:

ईश्वरस्य स्वगुरुजनानां च प्रिया: भवितुम्, भवन्त: सततं धर्ममार्गे चलित्वा, सत्कर्माणि कुर्वन्तु, गुरुजनानां आदरं कुर्वन्तु, श्रद्धया ईश्वरस्य उपासना कुर्वन्तु। अयं मार्गः ईश्वरस्य च गुरुजनानां च प्रियः भवितुम् उपयुक्तः।

व्याख्या:

ईश्वरस्य च गुरुजनानां च प्रियताम् प्राप्तुम्, मनुष्येण सततं धर्ममार्गे चलितव्यं, सत्कर्माणि कर्तव्यं, गुरुजनानां प्रति श्रद्धा तथा आदरः आवश्यकः। एतैः गुणैः मनुष्यः ईश्वरस्य च गुरुजनानां च हृदयेषु स्थानं प्राप्नोति।

MediumNCERT
Q7.6. रिक्तस्थानानि पूर्यत- (क) सनियम्येन्द्रियग्रामं ...। (ख) सन्तुष्ट: ... योगी। (ग) अनपेक्ष: ... दक्ष:। (घ) तेषामहं ... मृत्युसंसारसागरात्। (ङ) शुभाशुभपरित्यागी ... स मे प्रिय:।

उत्तर:

(क) सनियम्येन्द्रियग्रामं सुखी भवति। (ख) सन्तुष्ट: स योगी। (ग) अनपेक्ष: स दक्ष:। (घ) तेषामहं विमुक्तः मृत्युसंसारसागरात्। (ङ) शुभाशुभपरित्यागी स मे प्रिय:।

व्याख्या:

प्रत्येक रिक्तस्थानं पाठ्यपाठेन यथोचितं शब्दं पूरयित्वा वाक्यानि पूर्णानि कृतानि। (क) इन्द्रियग्रामं संयम्य सुखी भवति। (ख) सन्तुष्ट: एव योगी। (ग) अनपेक्ष: एव दक्ष:। (घ) तेषामहं विमुक्तः मृत्युसंसारसागरात्। (ङ) शुभाशुभपरित्यागी स मे प्रिय:।

EasyNCERT
Q8.7. निम्नपदेषु सन्धिच्छेद: विधेय:- अनन्येनैव, मयेव, करुण एव, निरहद्भार:, बुद्धिर्य:, मानापमानयो:,

उत्तर:

सन्धिच्छेदः- 1. अनन्येनैव = अनन्येन + एव 2. मयेव = मय + एव 3. करुण एव = करुण + एव 4. निरहद्भार: = निरहद् + भार: (निरहद् + भार: = निरहद्भार:) 5. बुद्धिर्य: = बुद्धि + र्य: 6. मानापमानयो: = मानापमान + यो: प्रत्येकं पदं यथावत् विग्रहेण सन्धिच्छेदं कृतम्।

व्याख्या:

सन्धिच्छेदे प्रत्येकं संयुक्तपदं तद्भागे विग्रहीतं। उदाहरणार्थ, 'अनन्येनैव' इति पदं 'अनन्येन' तथा 'एव' इति द्वयोः पदयोः योगेन प्राप्तम्। अन्येषु पदेषु अपि एवं सन्धिच्छेदः कृतः।

MediumNCERT