Chapter 1
Chapter 1 — अध्ययन नोट्स
NCERT-संरेखित · 9 नोट्स · 3 निःशुल्क दिखाए गए
उत्तरजीविता, वृद्धि तथा विकास
अवधारणाउत्तरजीविता, वृद्धि तथा विकास
इस खंड में हम बाल्यावस्था के महत्वपूर्ण पहलुओं — उत्तरजीविता, वृद्धि और विकास — के बारे में विस्तार से समझेंगे। उत्तरजीविता का अर्थ है जीवित बने रहना और जीवन संबंधी अनिवार्य कार्यों को कर पाना। बच्चों की उचित देखभाल, पर्याप्त पोषण और संक्रमणों से सुरक्षा उनकी उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है। कुपोषण और संक्रमणों से होने वाली बीमारियाँ जैसे तपेदिक, काली खाँसी, डिप्थीरिया, पोलियो, टिटनेस, मलेरिया, न्यूमोनिया आदि बच्चों की मृत्यु का कारण बनती हैं। भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु का एक बड़ा कारण अतिसार है, जो कुपोषण से जुड़ा होता है। वृद्धि का संबंध बच्चे के शरीर के आकार, वजन, कद और अंगों के भौतिक विकास से है, जिसे मापा जा सकता है। विकास का अर्थ है गुणात्मक परिवर्तन, जैसे बच्चे का सिर उठाना, बैठना, चलना आदि। विकास बहुआयामी होता है जिसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और भावनात्मक परिवर्तन शामिल होते हैं। विकास क्रमागत और विकासोन्मुख होता है, अर्थात् यह पूर्ववर्ती विकास पर आधारित होता है और बच्चे को अधिक परिष्कृत कौशल प्रदान करता है। वृद्धि और विकास के बीच अंतर को समझना आवश्यक है क्योंकि केवल शारीरिक वृद्धि स्वास्थ्य का संकेत नहीं होती, बल्कि संपूर्ण विकास के लिए उचित पोषण, स्वास्थ्य देखभाल और सामाजिक वातावरण जरूरी है। बच्चों की वृद्धि की निगरानी के लिए वृद्धि वक्र का उपयोग किया जाता है, जो सामान्यतः ऊपर की ओर बढ़ता है। यदि वृद्धि वक्र समतल हो जाए तो इसका अर्थ है वृद्धि रुक गई है, और नीचे गिरना स्वास्थ्य में गिरावट का संकेत है। उचित पोषण और संक्रमणों का उपचार वृद्धि को पुनः सक्रिय कर सकता है।
- उत्तरजीविता का अर्थ है जीवित रहना और आवश्यक जीवन क्रियाएँ करना।
- कुपोषण और संक्रमण बाल मृत्यु के मुख्य कारण हैं।
- वृद्धि भौतिक मापन योग्य परिवर्तन है, जबकि विकास गुणात्मक परिवर्तन।
- विकास बहुआयामी और क्रमागत होता है।
- वृद्धि वक्र से बच्चे की वृद्धि की स्थिति का पता चलता है।
- स्वस्थ विकास के लिए पोषण, स्वच्छता और सामाजिक वातावरण आवश्यक हैं।
- 📌 उत्तरजीविता – जीवित बने रहने और जीवन संबंधी अनिवार्य कार्य करते रहने की क्षमता।
- 📌 वृद्धि – शरीर के आकार, वजन और अंगों के भौतिक विकास।
- 📌 विकास – गुणात्मक परिवर्तन जो बच्चे को अधिक परिष्कृत बनाते हैं।
वृद्धि तथा विकास
अवधारणावृद्धि तथा विकास
वृद्धि और विकास के बीच अंतर को समझना बाल्यावस्था के अध्ययन में आवश्यक है। वृद्धि का संबंध मापन योग्य भौतिक परिवर्तनों से है जैसे वजन, कद, अंगों का आकार। विकास गुणात्मक परिवर्तन है, जैसे बच्चे का सिर उठाना, बैठना, चलना आदि। विकास बहुआयामी होता है जिसमें शारीरिक, मानसिक, सामाजिक, भावनात्मक और भाषा संबंधी परिवर्तन शामिल होते हैं। विकास क्रमागत होता है, अर्थात् प्रत्येक विकास पूर्ववर्ती विकास पर आधारित होता है। वृद्धि वक्र के माध्यम से बच्चे की वृद्धि की निगरानी की जाती है। सामान्य वृद्धि वक्र ऊपर की ओर बढ़ता है। यदि वृद्धि रुक जाए तो वक्र समतल हो जाता है और यदि स्वास्थ्य खराब हो तो नीचे गिर जाता है। उचित पोषण और संक्रमणों का उपचार वृद्धि को पुनः सक्रिय करता है। बाल्यावस्था के विकास के विभिन्न क्षेत्र हैं – शारीरिक, क्रियात्मक (मोटर), संवेदनात्मक, संज्ञानात्मक, भाषा संबंधी, सामाजिक, भावनात्मक और व्यक्तिगत विकास। ये सभी क्षेत्र एक दूसरे से जुड़े हुए हैं और एक समग्र विकास का हिस्सा हैं। उदाहरण के लिए, साइकिल चलाना सीखने वाले बच्चे में शारीरिक विकास के साथ भावनात्मक पक्ष भी होता है जैसे डर या उत्साह। बाल्यावस्था के विकास को तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है – शैशवावस्था (जन्म से 1 वर्ष), पूर्व विद्यालयी वर्ष (1-6 वर्ष), और विद्यालयी वर्ष (7-12 वर्ष)। इस वर्गीकरण के आधार पर पोषण संबंधी आवश्यकताओं में भी भिन्नता आती है।
- वृद्धि भौतिक मापन योग्य परिवर्तन है, विकास गुणात्मक।
- विकास बहुआयामी और क्रमागत होता है।
- वृद्धि वक्र से बच्चे की वृद्धि की स्थिति का पता चलता है।
- बाल्यावस्था के विकास के क्षेत्र: शारीरिक, क्रियात्मक, संवेदनात्मक, संज्ञानात्मक, भाषा, सामाजिक, भावनात्मक, व्यक्तिगत।
- विकास के क्षेत्र एक-दूसरे से जुड़े होते हैं।
- बाल्यावस्था के विकास को तीन चरणों में वर्गीकृत किया गया है।
- 📌 क्रियात्मक विकास – शारीरिक गतिविधियों और कौशलों का विकास।
- 📌 संवेदी विकास – देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्श करने की क्षमताओं का विकास।
- 📌 संज्ञानात्मक विकास – सोचने, समझने, याद रखने की क्षमताओं का विकास।
विकास के क्षेत्र
अवधारणाविकास के क्षेत्र
विकास के विभिन्न क्षेत्र बाल्यावस्था के संपूर्ण विकास को समझने में मदद करते हैं। ये क्षेत्र हैं: 1. शारीरिक विकास: शरीर के आकार, कद, वजन और अंगों के अनुपात में परिवर्तन। 2. क्रियात्मक (मोटर) विकास: शारीरिक गतिविधियों पर नियंत्रण, जैसे चलना, पकड़ना,
अभ्यास प्रश्न — Chapter 1
NCERT अभ्यास प्रश्न और उत्तर सहित
Q1.1. बच्चों से संबंधित संस्था या कार्यक्रम का दौरा करना (सरकारी/गैर सरकारी संगठन)। 2. संस्था या कार्यक्रम के क्रियाकलापों का अवलोकन करना। 3. अपने अवलोकनों के आधार पर रिपोर्ट लिखना।
उत्तर:
1. अपने क्षेत्र में बच्चों से संबंधित किसी सरकारी या गैर सरकारी संस्था या कार्यक्रम का चयन करें और उसका दौरा करें। 2. दौरे के दौरान संस्था या कार्यक्रम के विभिन्न क्रियाकलापों का ध्यानपूर्वक अवलोकन करें, जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, मनोरंजन आदि से जुड़ी गतिविधियाँ। 3. अपने अवलोकनों के आधार पर संस्था के उद्देश्य, आयु वर्ग, कार्यकर्ता, क्रियाकलाप, धन स्रोत आदि की जानकारी एकत्रित करें। 4. लगभग चार पृष्ठों में एक रिपोर्ट तैयार करें जिसमें संस्था के विभिन्न पहलुओं का वर्णन हो और अंत में निष्कर्ष दें।
व्याख्या:
यह अभ्यास विद्यार्थियों को बच्चों से संबंधित संगठनों के कार्यों को समझने और उनके क्रियाकलापों का अवलोकन करने का अवसर देता है। दौरे के दौरान नोट्स लेकर और संबंधित प्रश्न पूछकर आवश्यक जानकारी एकत्रित करनी होती है। रिपोर्ट में संगठन के उद्देश्य, कार्यप्रणाली, आयु वर्ग, कार्यकर्ता की भूमिका और धन स्रोत के बारे में विस्तार से लिखा जाता है।
Q2.बाल्यावस्था में 'उत्तरजीविता' का क्या अर्थ है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?
उत्तर:
उत्तरजीविता का अर्थ है जीवित बने रहना और जीवन संबंधी अनिवार्य कार्य करते रहना। यह इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि बच्चों की उचित देखभाल, पर्याप्त पोषण और संक्रमणों से सुरक्षा से ही वे स्वस्थ रह पाते हैं। उदाहरण के लिए, बच्चों को तपेदिक, काली खाँसी जैसे रोगों से बचाने के लिए टीकाकरण आवश्यक है।
व्याख्या:
उत्तरजीविता का मतलब है जीवित रहना और जीवन के लिए आवश्यक कार्य कर पाना। बच्चों की उचित देखभाल, पोषण और संक्रमणों से सुरक्षा उनकी उत्तरजीविता के लिए आवश्यक है। जैसे टीकाकरण से बच्चों को जानलेवा रोगों से बचाया जाता है।
Q3.निम्नलिखित में से कौन सा रोग भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु का प्रमुख कारण है?
उत्तर:
अतिसार
व्याख्या:
भारत में पाँच वर्ष से कम आयु के बच्चों की मृत्यु का प्रमुख कारण अतिसार है, जो कुपोषण से जुड़ा होता है। यूनिसेफ की रिपोर्ट के अनुसार 2015 में अतिसार के कारण 177300 बच्चों की मृत्यु हुई थी।
Q4.वृद्धि और विकास में क्या अंतर है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
वृद्धि का संबंध शरीर के आकार, वजन और अंगों के भौतिक मापन से है, जबकि विकास गुणात्मक परिवर्तन है जैसे बच्चे का सिर उठाना, बैठना, चलना। उदाहरण के लिए, बच्चे का वजन बढ़ना वृद्धि है और चलना सीखना विकास है।
व्याख्या:
वृद्धि मापन योग्य भौतिक परिवर्तन होते हैं जैसे कद, वजन बढ़ना। विकास गुणात्मक परिवर्तन होते हैं जैसे बच्चे का चलना, बोलना सीखना। दोनों में अंतर समझना जरूरी है।
Q5.चित्र 1 में बच्चों के आयु के अनुसार आकार को दर्शाया गया है। इस चित्र के आधार पर बताइए कि बच्चे की लंबाई और वजन में किस प्रकार का परिवर्तन होता है?
उत्तर:
बच्चे की लंबाई और वजन शैशवावस्था से विद्यालय पूर्व की उम्र तक निरंतर बढ़ते हैं। जैसे-जैसे आयु बढ़ती है, शरीर के अंगों का आकार भी बढ़ता है।
व्याख्या:
चित्र 1 में दिखाया गया है कि बच्चे की लंबाई और वजन समय के साथ बढ़ते हैं। शैशवावस्था में तीव्र वृद्धि होती है, जो पूर्व विद्यालयी और विद्यालयी वर्षों तक जारी रहती है।
Q6.निम्नलिखित में से कौन-से परिवर्तन विकास के उदाहरण हैं? (i) चलना से दौड़ना तक, (ii) भूख लगने पर रोना, (iii) पेशे का चयन करना।
उत्तर:
(i) और (iii) केवल
व्याख्या:
विकास दीर्घकालिक और गुणात्मक परिवर्तन होते हैं। चलना से दौड़ना तक का परिवर्तन और पेशे का चयन करना विकास के उदाहरण हैं। भूख लगने पर रोना अल्पकालिक व्यवहार है, इसलिए विकास नहीं है।
Q7.क्रियात्मक विकास के स्थूल और सूक्ष्म क्रियात्मक विकास में क्या अंतर है? उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
स्थूल क्रियात्मक विकास में बड़ी मांसपेशियों का नियंत्रण होता है, जैसे चलना, दौड़ना। सूक्ष्म क्रियात्मक विकास में छोटी मांसपेशियों का नियंत्रण होता है, जैसे लिखना, सिलाई करना। उदाहरण के लिए, बच्चे का दौड़ना स्थूल क्रियात्मक विकास है और पेंसिल पकड़ना सूक्ष्म क्रियात्मक विकास।
व्याख्या:
स्थूल क्रियात्मक विकास बड़ी मांसपेशियों की गतिविधियों पर नियंत्रण है, जैसे चलना, बैठना। सूक्ष्म क्रियात्मक विकास छोटी मांसपेशियों पर नियंत्रण है, जैसे अंगुलियाँ चलाना, लिखना।
Q8.नवजात शिशु की संवेदनात्मक क्षमताओं में जन्म के समय क्या विशेषताएँ होती हैं? उदाहरण दीजिए।
उत्तर:
नवजात शिशु की संवेदनात्मक क्षमताएँ जन्म से ही विकसित होती हैं, जैसे वह आठ इंच की दूरी तक किसी वस्तु पर अपनी आँखें केंद्रित कर सकता है। समय के साथ ये क्षमताएँ और परिष्कृत होती हैं।
व्याख्या:
शिशु जन्म के समय देखने, सुनने, सूंघने, स्पर्श करने और स्वाद लेने की क्षमताओं के साथ आता है। उदाहरण के लिए, नवजात शिशु आठ इंच की दूरी तक वस्तु देख सकता है।
Manav Paristhitiki evm pariwar vigyan Bhag-II के सभी 5 अध्याय
Home Science · Class 11